डीएमएफ घोटाले की गूंज अभी थमी नहीं, इधर निजी भूमि पर डीएमएफ से बाउंड्रीवाल निर्माण का नया विवाद

डीएमएफ घोटाले की गूंज अभी थमी नहीं, इधर निजी भूमि पर डीएमएफ से बाउंड्रीवाल निर्माण का नया विवाद

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  • डीएमएफ का स्वाद इतना मीठा कि स्थगन आदेश भी बेअसर!
  • रानू साहू डीएमएफ घोटाले की गूंज अभी थमी नहीं, इधर निजी भूमि पर डीएमएफ से बाउंड्रीवाल निर्माण का नया विवाद



राजपुर, बलरामपुर।

(समाचारवाणी) 

एक समय प्रदेश की राजनीति में भूचाल लाने वाला बहुचर्चित डीएमएफ घोटाला अभी लोगों की स्मृति से धुंधला भी नहीं पड़ा है और बलरामपुर जिले में फिर से अँगड़ाई लेने लगा हैं । तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू के कार्यकाल में सामने आई कथित डीएमएफ अनियमितताओं को लेकर जिस भाजपा ने सड़कों से लेकर विधानसभा तक हंगामा खड़ा किया था, उसी डीएमएफ फंड को लेकर अब बलरामपुर जिले में एक नया विवाद सामने आया है।




शासन द्वारा डीएमएफ राशि के उपयोग के लिए कड़े दिशा-निर्देश लागू किए जाने और खर्च के दायरे सीमित किए जाने के बावजूद राजपुर क्षेत्र में कथित रूप से निजी भूमि पर डीएमएफ मद से बाउंड्रीवाल निर्माण कराए जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल उठ रहा है कि आखिर डीएमएफ फंड में ऐसा क्या आकर्षण है कि अधिकारी संभावित कानूनी जोखिम उठाने तक को तैयार दिखाई दे रहे हैं?

आरोप है कि निर्माण कार्य को लेकर राजस्व न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किए जाने के बाद भी काम नहीं रोका गया, बल्कि उसे और अधिक गति से पूरा करने का प्रयास किया गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि जिस निर्माण कार्य पर रोक लगाने का आदेश जारी हुआ, वह डीएमएफ मद से स्वीकृत बताया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि निर्माण कार्य को शीघ्र पूरा कर उपयोगिता प्रमाण-पत्र (यूसी) प्राप्त करने की जल्दबाजी में आदेशों की भी अनदेखी की जा रही है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि शासन की राशि के उपयोग और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

मामले में ग्रामीण मदन सिंह द्वारा तहसीलदार राजपुर के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की गई थी। शिकायत की जांच के बाद तहसीलदार ने दिनांक 27 मई 2026 को निर्माण कार्य पर स्थगन आदेश जारी कर दिया। आदेश में उल्लेख है कि संबंधित भूमि खसरा नंबर 554/1 एवं 555 राजस्व अभिलेखों में निजी स्वामित्व की भूमि के रूप में दर्ज है तथा प्रस्तावित बाउंड्रीवाल निर्माण से उक्त भूमि प्रभावित हो रही है। इसके आधार पर निर्माण कार्य पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए गए।

लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि स्थगन आदेश जारी होने के बाद भी निर्माण कार्य बंद नहीं किया गया। उल्टे कार्य की गति बढ़ा दी गई और अधिक मजदूर लगाकर निर्माण को तेजी से पूरा करने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि स्थानीय थाना एवं संबंधित विभागों को आदेश की प्रतिलिपि भेजे जाने के बावजूद कार्य जारी रहा।

सीईओ जनपद और आरईएस इंजीनियर पर मिलीभगत का आरोप

शिकायतकर्ता ने कलेक्टर को दिए आवेदन में आरोप लगाया है कि डीएमएफ मद से स्वीकृत बाउंड्रीवाल निर्माण कार्य निजी भूमि पर कराया जा रहा हैं ।आवेदन में जनपद पंचायत राजपुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी तथा आरईएस विभाग के कार्यपालन अभियंता की भूमिका की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि दोनों अधिकारियों की कथित मिलीभगत से यह कार्य कराया जा रहा है और शासन की राशि के दुरुपयोग की आशंका है।

यूसी लेने की जल्दबाजी या कुछ और?

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि निर्माण कार्य को जल्द से जल्द पूरा कर उपयोगिता प्रमाण-पत्र (यूसी) प्राप्त करने की तैयारी की जा रही है। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि डीएमएफ की राशि निजी भूमि पर खर्च की गई है, तो यह मामला केवल राजस्व विवाद तक सीमित न रहकर वित्तीय अनियमितता का गंभीर प्रकरण बन सकता है।

प्रशासन के सामने कई सवाल

* जब तहसीलदार द्वारा स्थगन आदेश जारी किया जा चुका था, तब निर्माण कार्य कैसे जारी रहा?

* आदेश की सूचना संबंधित विभागों और थाना को भेजे जाने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

* डीएमएफ मद से स्वीकृत कार्य की तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति किन आधारों पर दी गई?

* यदि भूमि निजी है, तो उस पर सरकारी राशि खर्च करने की अनुमति किसने दी?

* आदेश के बाद हुए निर्माण और व्यय की जवाबदेही किसकी होगी?

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला डीएमएफ फंड के उपयोग और उसकी निगरानी व्यवस्था पर फिर से गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकता है।


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