पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को सांगीतिक श्रद्धांजलि, पंडवानी कला के संरक्षण के लिए राज्य सरकार ने की तीन बड़ी घोषणाएँ..
रायपुर के मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने की महत्वपूर्ण घोषणाएँ, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की प्रेरणा से लोककला संरक्षण का संकल्प दोहराया..
रायपुर।छत्तीसगढ़
(समाचारवाणी)
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की अमर स्वर-साधिका, पद्म विभूषण एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पंडवानी गायिका स्वर्गीय डॉ. तीजन बाई को बुधवार को राजधानी रायपुर स्थित मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में आयोजित भव्य सांगीतिक श्रद्धांजलि समारोह में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में प्रदेश के जनप्रतिनिधियों, लोक कलाकारों, साहित्यकारों, सांस्कृतिक संस्थाओं तथा बड़ी संख्या में कला प्रेमियों ने उपस्थित होकर लोककला की इस महान विभूति को नमन किया।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन के पर्यटन, संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि स्वर कभी मौन नहीं होते, वे समय की सीमाओं को लाँघकर युगों तक जनमानस की चेतना में गूंजते रहते हैं। डॉ. तीजन बाई का स्वर भी छत्तीसगढ़ की लोकआत्मा का अमर नाद है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति, परंपरा और लोकगौरव से सदैव जोड़ता रहेगा। उन्होंने कहा कि डॉ. तीजन बाई केवल एक महान लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की जीवंत पहचान थीं। उन्होंने पंडवानी जैसी लोकवाचिक परंपरा को देश-दुनिया के मंचों तक पहुंचाकर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया। उनकी कला, साधना और समर्पण सदैव कलाकारों और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।
कैबिनेट मंत्री श्री अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में राज्य सरकार छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इसी कड़ी में डॉ. तीजन बाई की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से तीन महत्वपूर्ण घोषणाएँ की गईं। उन्होंने घोषणा की कि अब प्रत्येक वर्ष पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के नाम पर पंडवानी कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कलाकार को राज्य सम्मान प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान लोककलाकारों को प्रोत्साहित करने और पंडवानी जैसी समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। दूसरी घोषणा के तहत डॉ. तीजन बाई के जन्मस्थल गनियारी ग्राम को "कलाग्राम" के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे वहां लोककला, लोकसंगीत एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का संरक्षण और विकास सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा उनके जीवन और साधना के प्रतीक रहे प्रिय तंबूरे को रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में संरक्षित एवं प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनके जीवन, संघर्ष और कला साधना से प्रेरणा प्राप्त कर सकें।
श्रद्धांजलि समारोह में लोक कलाकारों ने पंडवानी और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की मनमोहक प्रस्तुतियों के माध्यम से डॉ. तीजन बाई को अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरा परिसर उनकी स्मृतियों और लोकधुनों से गुंजायमान रहा। उपस्थित जनसमूह ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए तथा उनके योगदान को याद किया। कार्यक्रम में अनेक पद्मश्री एवं राज्य अलंकरण से सम्मानित कलाकार, जनप्रतिनिधि, साहित्यकार, संस्कृति विभाग के अधिकारी तथा कला प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. तीजन बाई ने जिस प्रकार अपनी अद्भुत प्रतिभा और अथक साधना से पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई, वह छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।
अपने संबोधन के अंत में संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ को डॉ. तीजन बाई पर सदैव गर्व रहेगा। उनकी अमर लोकधुनें, सशक्त वाणी और लोकसंस्कृति के प्रति उनका समर्पण आने वाले समय में भी समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता रहेगा तथा उनकी विरासत सदैव जनमानस की चेतना में जीवित रहेगी।







